Monday, 23 October 2017

आंटी तू कहाँ चली गई

अभी तो स्कूल में तुझसे मिला था।
ऐसे, बिन बताए यूँ कहा चली गई।।
हज़ारो  की  आँखों  को नम करके,
इस  तरह  आंटी  तू कहाँ चले गई।।

बचपन में पैंट हमारी
गीली पीली होती तो
तू चुपचाप पैंट बदलती थी।
छिदी फटी पैंट को भी
चुटकी मे सिल देती थी।।
मगर आज तेरे लिए
साड़ी खरीदने की उम्र हुई तो
आंटी तू कहाँ चली गई।।

ग्राउंड में घुटना हमारा
छिल जाता था।
और तू उसपर मरहम
लगा देती थी।।
आज दर्द दिल में है
आंटी, तू कहाँ चली गई।।

जब टिफ़िन घर पे
भूल जाता था।
तू टिफ़िन भी खिला
दिया करती थी।।
अब तुझे बाहर खिलाने
की बारी आई तो
आंटी तू कहाँ चली गई।।

टीचर्स डे पे हमारे लिए
लावणी तू करती थी।
हँसते-हँसते तालियाँ
बजाया करते थे।
मगर आज हम तेरे संग
नाचना चाहते है तो
आंटी तू कहाँ चले गई।।

तू हमारी यादों में
हमेशा से ही बसी हुई है।
हर बच्चे को नाम से
तू पहचान लिया करती थी।।
मगर आज जब हमारी
पहचान बनाने की बारी आयी
तो आंटी तू कहाँ चली गई।।

बचपन मे आंसू हमारे बहते थे।
तू उनको पोछ दिया करती थी।।
अभी भी मगर आंसू बह रहे है
और आंटी तू कहाँ चले गई।।

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